6 जून 1981 के दिन, शाम का वक्त था. उन दिनों, बारिश का मौसम चल रहा था. 9 बोगियों वाली पैसेंजर ट्रेन यात्रियों से खचाखच भरी हुई थी. गाड़ी संख्या 416dn मानसी से सहरसा की ओर जा रही थी.भारत (India) में होने वाले रेल हादसों (Rail Accidents) में हर साल सैकड़ों लोगों की जानें जाती हैं. हालांकि, बीते कुछ सालों से रेल हादसों पर जबरदस्त लगाम लगी है और ऐसे हादसों में मारे जाने वालों का आंकड़ा भी काफी कम हुआ है. देश में होने वाले रेल हादसों की कई वजहें होती हैं. इन हादसों में तकनीकी खराबी, मानवीय भूल, लापरवाही, खराब मौसम आदि शामिल हैं. सरकारी आंकड़ों (Government Data) के मुताबिक साल 2019 में रेल हादसों के लिहाज से काफी सुरक्षित रहा. भारतीय रेलवे के इतिहास में 166 साल बाद ऐसा हुआ, जब रेल दुर्घटना में एक भी व्यक्ति की जान नहीं गई. लेकिन, देश में एक ऐसा रेल हादसा भी हुआ था जिसे भूल पाना नामुमकिन है. इस रेल हादसे ने सिर्फ देश को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया था.

6 जून 1981 को हुआ था जीवनभर याद रहने वाला भयानक रेल हादसा6 जून 1981 के दिन, शाम का वक्त था. उन दिनों, बारिश का मौसम चल रहा था. 9 बोगियों वाली पैसेंजर ट्रेन यात्रियों से खचाखच भरी हुई थी. गाड़ी संख्या 416dn मानसी से सहरसा की ओर जा रही थी.

आज हम आपको भारतीय रेल इतिहास के सबसे भयानक हादसे के बारे में बताने जा रहे हैं. इस हादसे ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था. 6 जून 1981 के दिन, शाम का वक्त था. उन दिनों, बारिश का मौसम चल रहा था. 9 बोगियों वाली पैसेंजर ट्रेन यात्रियों से खचाखच भरी हुई थी. गाड़ी संख्या 416dn मानसी से सहरसा की ओर जा रही थी. ट्रेन बदला घाट और धमारा घाट स्टेशन के बीच अभी बागमती नदी से गुजर ही रही थी कि एक भयानक हादसा हो गया. ट्रेन बागमती नदी (Bagmati River) के ऊपर बने पुल संख्या-51 पर दुर्घटनाग्रस्त हो गई. हादसे के कारण ट्रेन के पिछले 7 डिब्बे उससे अलग होकर नदी में गिर गए. बारिश की वजह से बागमती का जलस्तर बढ़ा हुआ था जिसकी वजह से ट्रेन पलक झपकते ही नदी में डूब गई.

बागमती नदी में डूब गए थे ट्रेन के 7 डिब्बे6 जून 1981 के दिन, शाम का वक्त था. उन दिनों, बारिश का मौसम चल रहा था. 9 बोगियों वाली पैसेंजर ट्रेन यात्रियों से खचाखच भरी हुई थी. गाड़ी संख्या 416dn मानसी से सहरसा की ओर जा रही थी.

यह हादसे के बाद जब ट्रेन के 7 डिब्बे नदी में गिरे तो वहां यात्रियों की चीख-पुकार मच गई. ट्रेन में सफर करने वाले यात्री अपनी जान की भीख मांगते हुए चीखते-चिल्लाते रहे लेकिन उस वक्त उन्हें बचाने वाला वहां कोई नहीं था. जब तक आसपास के लोग नदी के पास पहुंचते, तब तक सैकड़ों लोगों की नदी में डूबकर मौत हो चुकी थी. इस हादसे को भारत का सबसे बड़ा और विश्व का दूसरा सबसे बड़ा रेल हादसा बताया जाता है. इस भीषण रेल हादसे के बाद कई दिनों तक सर्च ऑपरेशन चला. गोताखोरों ने 5 दिन की कड़ी मशक्कत के बाद नदी से 200 से भी ज्यादा लाशें निकालीं. बताया जाता है कि कई लाशें तो ट्रेन के अलग-अलग हिस्सों में फंसी हुई थीं. इसके अलावा कई लोगों की लाशें नदी के बहाव के साथ बह गईं. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि इस हादसे में करीब 300 यात्रियों की मौत हुई थी जबकि आसपास के लोगों ने बताया कि देश के इस सबसे बड़े रेल हादसे में करीब 800 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी.

हादसे को लेकर कई वजहें बताते हैं लोग6 जून 1981 के दिन, शाम का वक्त था. उन दिनों, बारिश का मौसम चल रहा था. 9 बोगियों वाली पैसेंजर ट्रेन यात्रियों से खचाखच भरी हुई थी. गाड़ी संख्या 416dn मानसी से सहरसा की ओर जा रही थी.

6 जून, 1981 को हुए इस हादसे की वजह को लेकर कई कारण बताए जाते हैं. कोई कहता है कि तेज आंधी की वजह से ये हादसा हुआ था तो कोई कहता है कि नदी में अचानक बाढ़ आ जाने की वजह से ट्रेन दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी. इसके अलावा कुछ लोगों का ये भी कहना है कि पुल पर आई एक गाय को बचाने के लिए लोको पायलट ने अचानक तेज ब्रेक लगा दिए थे, जिसकी वजह से ट्रेन के पिछले 7 डिब्बे पलट गए और पुल को तोड़ते हुए नदी में जा गिरे और फिर डूब गए. इस रेल हादसे को आने वाली 6 जून को पूरे 40 साल हो जाएंगे, लेकिन इसका दर्द अभी तक कम नहीं हुआ है।

Gurudev kumar

Editor-in-chief

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